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Friday, February 14, 2014

जिन्दा हो तुम..!!

एक एहसास के अभी जिन्दा हो तुम
कभी इस एहसास को एहसास  करने का वक़्त निकालो यारों
कि छोड़ कर तुम भागना आज
कुछ अधूरी रह गई ख्वाइशों पर नज़र डालो यारों
आँखें बंद करके एक लम्हा
जरा इस वक़्त कि रफ़्तार तो पहचानो यारों

कैसा है ये सफ़र जिंदगी का
कि चल रहा है वक़्त उसी रफ़्तार से
पर ना जाने जिंदगी थम सी गई है कहीं

जीने की खातिर खुदको रोज़ मार देते हैं
दिल में बसें अरमानों को मज़ाक में टाल देते हैं
जीने कि उम्र में टूट रहें  हैं हम
धड़कता दिल सुनके याद आता है कि जिन्दा हैं हम

रात के अंधेरो में जब कुछ यादों को बटोरा
एहसास हुआ कि कितने वक़्त से रोये नहीं
नींद तो रोज़ आ जाती है लेकिन
ना जाने कितने वक़्त से सोये नहीं

अधूरे ख्वाब अधूरी चाहत
सब अधूरा ही रह  जाएगा
निकल जाएगा ये वक़्त यूँ ही कश्मकश में
सब वक़्त यूँ ही गवां देने से पहले

एक एहसास के अभी जिन्दा हो तुम
कभी इस एहसास को एहसास करने का वक़्त निकालो यारों
कि छोड़ कर तुम भागना आज
कुछ अधूरी रह गई ख्वाइशों पर नज़र डालो यारों

Wednesday, August 28, 2013

जिंदगी आजकल...

Had written this poem long back, posting it here today ...


लेकर चले थे जो एक छोटी सी ख्वाइश घर से
ना जाने कितनी दूर आ गए हैं
हो चुकी ना जाने कितनी ख्वाइशे पूरी
फिर भी ना जाने क्यों है जिंदगी अधूरी

अनजानों के साथ अनजानी राह पर चलते
ना जाने अपने कब अनजान हो गए
भागते रहे हम दूर इतना कि
अपने ही घर में मेहमान हो गए

हँसते हैं मुस्कुराते हैं और इश्क भी जताते हैं
फिर भी न जाने क्यों अपने को तनहा ही पाते हैं
कोई सुन न ले रात में ये सिसकिया हमारी
कुछ इसलिए भी हम रात जाग कर बिताते हैं

चलते जा रहे हैं हम दूर पर मंजिल नजर आती नहीं
खरीदे हुए सामानों से मन तो बहलता है पर ख़ुशी नजर आती नहीं
देखते हैं पुरानी यादो को अक्सर
पर याद क्यों अब रुलाती नहीं

मन करता है की जा सकू फिर से वापस
ले सकू सुकून  की एक नींद यू दादी की गोद में
रो सकू जी भर के जहाँ
और बता सकू की क्यों रोया हूँ मैं

पर फंस गया हूँ जिंदगी में इस खातिर
की बस अब यही सब सोचता हूँ मैं
रोज सोते वक़्त आँखों से आते पानी को
ना टूट जाने के डर से पोंछता हु मैं

ना जाने हर रात को बैचैन सा
यही सब सोचता हु मैं ॥

Monday, May 23, 2011

एक तस्वीर

आज आइना देखा तो एक तस्वीर नजर आई 
एक अनजाना चेहरा जो कभी जाना पहचाना सा था
वो रास्ते जिन पर कभी चलने का सोचा ही नहीं 
आज उन रास्तो से क्यूँ दोस्ताना सा था

जूठे चेहरों से भरी धुंधली सी जिंदगी 
हर दर्द पर यूँ हंसती हुई जिंदगी 
हर पल जब यूँ बोझिल सा हो उठा 
याद आया की ये इंसान भी कभी मस्ताना सा था 

Saturday, April 9, 2011

यही जिंदगी है ....

जब कुछ सपने यूँ झटके से टूटे
जो थे अपने जब वही निकले झूठे 
जब अरमानो की लाश को खुद आग दी
तब अहसास हुआ यही जिंदगी है

कभी दुसरो की खातिर कभी अपनों की खातिर
झूठी मुस्कराहट बिखेरते बिखेरते 
दिखा दर्पण जब एक दिन
अहसास आया यही जिंदगी है

बहुत हस लिए जब दूसरो पर 
खुदको जब देखा एक दिन 
और फूट फूट कर रोया
खुदको समझाया यही जिंदगी है

जब खूब दौड़ कर भी वो ना कर सके हासिल
जो पाना था बहुत पीछे रह गया
जहा देखने पर सक धुंधला नजर आता है
अहसास हुआ यही जिंदगी है

रोते हुए चेहरे पर जब पड़ी खुशिओ की चमक
पहली बार जिंदगी का अहसास लिया 
और खुशिया देने वाले ने जब कीमत मांग ली
अहसास हुआ यही जिंदगी है 

Sunday, April 3, 2011

हर तरफ लगे हैं मेले ....

हर तरफ लगे हैं मेले 
बस खुशिओ का समां है
आज देखा हर तरफ
मेरा भारत जवा है

निकला जब लोगो का काफिला
तिरंगे को लेकर
आज देखा देशप्रेम का
असली जज्बा यहाँ है

ना जात पात का नाटक
ना दिलो में दूरिया हैं
आज देखो भारत की
सच्ची एकता यहाँ हैं

बीस साल बाद फिर से 
एक तूफ़ान आया है
विश्व-कप जीत कर भारत ने 
दुनिया भर में तिरंगा फेहराया है 

आज सारी रात बस जश्न की रात है
क्रिकेट का भगवान् सचिन हमारे साथ है
चलो मिल कर करते हैं जश्न
आज जश्न में पूरा वतन हमारे साथ है 

Saturday, March 12, 2011

एक अदनी सी जिंदगी ...

एक अदनी सी जिंदगी जिसमें हर और ख्वाहिशें कुचली जाती हैं
रौशनी की किरणें भी क्यों धकेल कर अँधेरे में ही ले जातीं हैं
जब होना न था तुम्हे पूरा तो क्यों तमन्ना जाग उठी
पल दो पल की खुशियाँ दे फिर दर्द की राग उठी


मुझे ऐ जिंदगी मेरा कुसूर बता दे
मोहब्बत न हो कभी इतना गुरूर दिला दे
या तो मुझे जीने ही न दे
या फिर ऐसे जीने की उसूल सिखा दे ||

Thursday, January 27, 2011

सुलगती हुई जिंदगी...

This poem is dedicated to all Smokers.....

धीरे से सुलगती हुई जब साँसों में तू जाती है
लगता है ऐसे जैसे जन्मो की प्यास बुझाती है
हर मुश्किल हर परेशानी में बस याद तेरी ही आती है
ना मिले तू तो जैसे जान पर बन आती है
हम हर मिनट हर लम्हा बस तुझे ही सुलगाते रहे
अपनी ही जिंदगी को यू धुए में उड़ाते रहे
जानते है जिंदगी घट रही है हर कश के साथ
फिर भी हर कश के बाद ना जाने क्यों मुस्कुराते रहे

आज हम हैं यहाँ इस बिस्तर पर मौत के इंतज़ार में
सोचते है क्यों पड़े इस धुए के प्यार में
जब जानते थे की मिल रही है मौत हमे उपहार में
अब बंद किया है ढूंढना जीत अपनी हर एक हार में
अब बंद किया है ढूंढना जीत अपनी हर एक हार में||


Smoking kills!!!!! ...Mind it!!

Monday, January 24, 2011

जंग...

यह कविता एक सैनिक के दिल का हाल बताती है|

जंग से पहले ......

जिंदगी की डोर को हाथ में ले उससे पतंग की तरेह उड़ाते रहे
कभी कांटो में उलझाया तो कभी हवा में झुलाते रहे
जूनून था सर पर कुछ कर गुजर जाने का
इस तमन्ना की खातिर बस खुदको अजमाते रहे
तंग हो गए जब आग की लपटों से
झूठे वादे और इन आतंकी कपटीयों से
आज हमने फिर बन्दूक उठाई है
दुश्मन छुप ले जहाँ छुपना है
आज तुझे लेने तेरी मौत आई है||

और जब जंग जीत जाते हैं ...........

सोचा था शान्ति होगी इस जंग के बाद
अमन का पैगाम आएगा कुछ चीखों के बाद
पर चिराग लेकर अब हम लाशें ढूँढा करते हैं
नफरत दुश्मन से नहीं अब अपने आप से किया करते हैं
अब हर और बर्बादी का मंजर नज़र आता है
हर इंसान के हाथ में एक खंजर नज़र आता है
कहा करते थे ये धरती माँ है हमारी
आज हर कतरा इसका बंजर नज़र आता है
बस हर और बर्बादी का मंजर नज़र आता है||

Saturday, January 22, 2011

अच्छे थे वो पल...

आज पुरानी अलमारी में वो किताब नज़र आ गई
बचपन की तस्वीरो से कुछ याद मुझे दिला गई

अच्छे थे वो पल की जब चाहो तब रो लेते थे
और खिलौने ही दुनिया की सबसे बड़ी ख़ुशी दे देते थे

रातों को जब हम यूँ चैन की नींद सो जाते थे
जब पापा आकर रात को चादर हमें उड़ाते थे

अच्छे थे वो पल जब सब साथ घूमने जाते थे
सी-सी करते हुए भी हम खूब पानीपूरी खाते थे

त्योहारों पर जब हम खूब उछलते गाते थे
जब मौसी मौसा आकर गोदी में हमे उठाते थे

अच्छे थे वो पल जब डर ना किसी बात का था
जब प्यार का मतलब सिर्फ सर पर दादी का हाथ था

याद करके ये सब कुछ आँखे मेरी भीगा गई
बचपन की तस्वीरे फिर याद सब दिला गई ||

Friday, January 21, 2011

डर लगता है...

डर लगता है जिंदगी से की इसे खो ना दूँ कहीं
डर  लगता है निकलने में बाहर की रो न दूँ कहीं

उठा सकूँ नज़र जमीं से इतनी हिम्मत ही नहीं
ढूंढ रहा हूँ कुछ अपना जो खोया है यहीं कहीं


क्यों उसकी सिर्फ याद से दिल सहम जाता है
क्यों मुझे आजकल अपने आप पर रहम आता है

डर लगता है खुशियों से की वो कल लौट जाएंगी
फिर याद आ आ कर मुझे यूँ ही रुलाएंगी
धागा धागा करके खुल रही है ये जिंदगी की डोर
मधुर संगीत भी लगता है जैसे मचा रहा हो कोई शोर

बस अब चारो और अँधेरा है और शान्ति सी छाई है
जिंदगी में बस अब तन्हाई ही तन्हाई है

डर लगता है जिंदगी से की इसे खो ना दूँ कहीं
डर  लगता है निकलने में बाहर की रो न दूँ कहीं ||

Thursday, January 20, 2011

क्यों आए तुम !!

जला के मैंने तुम्हारी आरजू , जिंदगी को अपनी दफ़न कर दिया 
हँसते मुस्कुराते चेहरे पर अपने, उदासी का कफ़न जड़ दिया 

अलग थे रास्ते अलग थी मंजिले 
फिर क्यों थोड़ी दूर भी साथ चले

वादा कर दिया जब हमने जिंदगी भर साथ निभाने के लिए 
तुम कहते हो की खेल रहे थे तुम हमे आजमानें के लिए 

बन गए हो ख्वाब बनकर सीने में इस कदर 
और चैन की नींद में हो तुम इन सबसे बेखबर

आज खुदको देखा आईने में तो एक अलग इंसान नज़र आ गया
ऐसा क्या नशा है तुम्हारा की मुझे ऐसा बना गया

मोहब्बत ही तो की कौनसा गुनाह कर दिया
बस गलती यही हुई की जो भी किया वो बेपनाह कर दिया

अब दिल चाहता है कहीं दूर चले जाने को
याद न आओ तुम कुछ ऐसा वक़्त बिताने को

जला के मैंने तुम्हारी आरजू , जिंदगी को अपनी दफ़न कर दिया 
हँसते मुस्कुराते चेहरे पर अपने, उदासी का कफ़न जड़ दिया ||

Sunday, January 16, 2011

जाने अनजाने में ...

जाने अनजाने में तुझसे प्यार करता रहा
घडी दर घडी तेरा इंतज़ार करता रहा
झूठे वादों में तेरे जिंदगी बिता दी
क्यूँ सब जान कर भी ऐतबार करता रहा
जानता हूँ की तू नही होगी कभी मेरी 
फिर क्यूँ बार बार तुझसे इकरार करता रहा

सुना है मिलती है ख़ुशी उम्मीद छूट जाने क बाद
उम्मीद छोड़ने की कोशिश मैं बार बार करता रहा
न दिया तुमने जवाब एक बार भी
फिर क्यूँ मैं बार बार वही सवाल करता रहा
अभी सूखे नहीं थे पुराने जख्म भी 
की मैं बार बार नए घाव करता रहा
जुदा हैं हम जुदा हो तुम
सब समझ कर भी मैं क्यों नादान बनता रहा 
क्यूँ सब जान कर भी तुझसे प्यार करता रहा||

Tuesday, January 11, 2011

कुछ पता नहीं....

लडखडा के चल दिए यू सुनसान सडको पर
मंजिल है कहाँ हमे कुछ पता नहीं
चंद लम्हों के दामन में खुशिया समेट लाया था
अब वो लम्हे है कहाँ हमे कुछ पता नहीं
मोहब्बत ने ग़ालिब शायर बना डाला
नशा शबाब का है की हमे कुछ पता नहीं

शराब पी कर की तुम्हे भुलाने की कोशिश
पर अब जहाँ देखता हूँ तुम ही तुम हो
समझ नही आता तुम्हे ख़ुशी कहूँ या गम
हँसता हूँ तो याद आती है
रोता हूँ तो याद आती है
चेहरा तुम्हारा देखे सदिया बीत गई
जिंदा भी हूँ मैं हमे कुछ पता नहीं ||

Sunday, January 9, 2011

ना जाने क्यों ||

ना जाने क्यों जिंदगी को तेरी आदत सी पड़ गई 
जानते हैं की हम नहीं हैं तेरे काबिल 
ना जाने क्यों तू मेरी चाहत बन गई
जिंदगी चल रही है बस तेरे इंतज़ार में
आई जो तू मेरी साँसे थम गई
जानते थे की तुम हो कुछ पलों क लिए
फिर क्यों मुझे तेरी आदत सी पड़ गई ||
अब तुम दूर हो और हम दूर हैं
तुम खुश हो और हम मजबूर हैं
जीना होगा ऐसे भी कभी सोचा भी नहीं
रो देते हैं अक्सर तेरी तस्वीर देख कर
खुश रहना है कैसे तुम्हारे बिना, तुमने सिखाया क्यों नहीं
जिंदगी चल रही है बस जिंदगी की खातिर
क्यों तुम एक ख्वाब बनकर मेरे सीने में बस गई
सोचता हू क्यों जिंदगी को तेरी आदत सी पड़ गई ||

Monday, August 16, 2010

जिंदगी ||

दुनिया की भीड़ में अकेला सा चल रहा हूँ ,
मुस्कराने की चाह में आंसुओं से लड़ रहा हूँ |
खुशिया बिखरीं हैं हर और मेरे ,
ना जाने हर पल क्यों यू कमजोर पढ रहा हूँ ||

चारों और बह रहीं हैं ठंडी हवाएं ,
ना जाने क्यों मैं गर्मी से भभक रहा हूँ |
उजियारा हर और छा रहा अब जिंदगी में ,
फिर क्यों अँधेरे की खातिर तड़प रहा हूँ ||

ऋणात्मकता से भर चली है ये जिंदगी ,
जाने कब ये ऋण चूका जाएगा |
प्रतीक्षा करने की आदत है मेरी और समय यू ही निकल जाएगा ,
बेक़रार हूँ में जिस कल के लिए , वो कल न जाने क्या रंग लाएगा ||

Monday, May 31, 2010

क्षत विक्षत जिंदगी

क्षत विक्षत सी हालत में,
जिंदगी यूँ ही चल रही है,
जो कभी मेरा हो ना सकेगा,
क्यों उसी की आज कमी खल रही है

आंसू के दो कतरे पलक से टपके
याद आया मेरे सपनों की चिता जल रही है
धुंधला सा हो चला है सब कुछ
किसी के लिए मेरी जिंदगी गल रही है

शरीर है जड़, ना सोचने की ताकत
ना जाने क्या बिमारी अंदर पल रही है
मस्तक पे चिंता की लकीरें
आँखे क्यों अंदर गढ़ रहीं हैं

क्षत विक्षत सी हालत में,
जिंदगी यूँ ही चल रही है,

सपनों का आशिया यूँ जमीं पर बिखरा
हर और बस काली हवा चल रही है
देख के जलती हुई आशिआने की लाश
जवानी कूद जाने को मचल रही है

तड़प रही है जिंदगी बेबस सी होकर
धड़कन है की बस धड़क रही है
सुन ली गई है शायद मेरी फ़रियाद 
धड़कन धीरे-धीरे अब थम रही है

क्षत विक्षत सी हालत में,
जिंदगी यूँ ही चल रही है,
जो कभी मेरा हो ना सकेगा,
क्यों उसी की आज कमी खल रही है